Friday, October 17, 2014

शब्दों की पुकार

कभी कभी शब्द
खो देते हैं अपने मायने
अपने होने का अर्थ
हम पुकारते रह जाते हैं
पर आवाज़ कहीं गुम हो जाती है
पहुचती नही लोगों के कानों तक
या शायद भुल जाती है
गले से निकलना
या खो जाती है
किसी अंतहीन गली के
अंतहीन सिरों में …
तो इन शब्दो के मायने ही क्या
क्यू हैं ये हमारी ज़िंदगी में
मिट क्यू नही जाते ये
तब ना होगी पुकार
न होगा दंश
की किसी ने नहीं सुनी पुकार
तब
नही खोएंगे शब्द
अपना अर्थ
अपने होने के मायने
ओ शब्द तुम खो जाओ

भाषा तन -मन की

मैने मांगा मन,
उसने मांगी देह
मैंने अनाव्रत्त कर दिया खुद को
उघाड दी देह
उसने जी भर रौंदा
देह के हर वृत्त को
उभारों को
सहलाया,मसला
जब उब गया मन
ढीला छोड दिया हर बंधन
हांफते कुत्ते की तरह
अपने होंठों पर तृप्ति की
जुबान फेर पसर गया उसका तन
अब वो लालायित नहीं है
छुने को ठंडा जिस्म
अब नहीं फैलती
उसके होंठों पर वो
छत्तीस इंची मुसकान
क्योंकि अब उसने पा लिया है
जब तब रौंंदने को एक शरीर
मन का क्या है
उसे समझ पाये या ना समझे
उसे तो मतलब है
सिर्फ देह के भुगोल से .......

दर्द

पुराना कोई रोग फ़िर से उभर आया है शायद …
कभी-कभी दर्द और रोग भी
मजा देने लगते हैं
जब जिंदगी
सजा सी लगने लगती है
बोझिल होता है मन और
शिथिल होने लगता है तन
ये दर्द ही हमें
अपने होने अहसास दिलाते हैं
वरना यूँ तो गुम हो जाते हैं हम
इस दुनिया की भीड में
कहाँ किसी को है फुरसत कि
वो झांके खुद में ही.....
दर्द ही आभास देता है कि
जिंदगी मुझमें
बाकि है अब भी......
आज सुबह से ही वो अपनी डायरी को खोजने में जुटी थी।डायरी जिसमें कैद थी उसकी तमाम आरजुएं,हसरतें,उसके आँसू,दर्द ,उसका बचपना…कितना कुछ जो सबसे छुपाकर रखा था।
घर का कोना कोना छान मारा।डायरी कहीं नहीं मिली।वो रूवांसी सी होकर बैठ गई।
तभी बेटे ने कंधे पर हाथ रखा।क्या हुआ माँ ,क्यूं परेशान हो।कुछ नहीं मेरी डायरी नहीं मिल रही।वो तो रद्दी में बेच दी माँ।
फिर बेटे ने गळे से लगाते हुए कहा-माँ भूल जाओ अतीत की कङवाहट को।हम सब साथ हैं वर्तमान में जीयो ना।
उसे लगा बेटा सच कह रहा है।उसे यादों में जीना छोङ वर्तमान में जीना चाहिये और भविष्य को सुखद बनाने की कोशिश करनी चाहिये।उसने अपने आँसू पोछे और होंठों पर मुस्कुराहट बिखेरी।वो यादों में नहीं जियेगी।

जाने कब तक
ठहरे
हमारी यादें
तेरे दिल के
दालान मैं ...
हम तो
चिरैया हैं
बस यादों के पंख
फैलाए
आ बैठे हैं
कभी दालान मैं
कभी सेहन मैं ...
हमारे पंखो को
सहेजना है
या कतरना
अब तुम ही
कर लो फ़ैसला ....
………नीता.…

लिखना चाहती थी
एक प्रेम कविता
जिसमे तुम होते
मैं होती
होता वो
खुला आकाश
कि
जिसके तले
मिल कर
सजाए थे
कुछ ख्वाब
कुछ हसरतें …
………

पर लिख रही हूं
तुम्हारे मेरे बीच की
बढती गलतफहमीया
गहराते अंधेरो में
गुम होते हम तुम
बढता अविश्वास
घटती दीवानगी
बढती बैचेनी
क्या
प्यार बचा है हममे
अब भी …


मिली की आंखों में आंसू थे।उसने एक नजर चाँद को देखा ओर एक नजर लाल टी-शर्ट वाले की तसवीर को।भारी मन से तसवीर सामने रख कर ,पहले चांद की और फिर लाल टी-शर्ट वाले की तसवीर की पूजा करके चाँद को अर्ग दिया।उसे पूरा भरोसा था,उन दोनों के मध्य फासले भले बढ गए हों,फैसला प्यार के हक में ही होगा।मतभेद ,मनभेद में नहीं बदलेगा।उनका प्यार कभी कम नहीं होगा।वो करवा चौथ के दिन जरूर आएगा।उसने वो तमाम खिङकी ,दरवाजे खोल दिये थे।जिसे उसने बङी ही मजबूती से बंद कर दिया था और फिर भी जिनकी दरारों से प्यार हरदम टपकता रहता था।आसमान का चाँद तो आ गया था।अब उसे इंतजार था तो बस …अपने चाँद का।

Wednesday, October 15, 2014

जब हवाओं में सिहरन हो
हल्की गुलाबी ठंड हो
हवाएं छू कर जाएं तेरी  उड़ती जुल्फो को
तब याद करना तुम मुझे 
मेरे साथ गुजरे वो पल
जब सर्द हवाओं ने 
हाथ तेरा थामा  था
और मेने 
अपनी नर्म हथेली को
तेरे हाथों से छुआ दिया था
एक ही पल में 
बिना देरी किये 
तुमने कसकर जकड़ लिया था मुझे 
अपनी बाहों में और
रख दीये थे 
मेरे कापते लरजते होठों पर 
अपने होठ
प्रीत की वो पहली मुहर
भूल मत जाना 
भूल मत जाना प्रितम

Tuesday, October 14, 2014

क्या मिल पाएंगे
हम तुम
फ़िर कभी या
कि जैसे मिलती हे
धरा आसमां से
उसी तरह
 रह जाएंगे
 हम तुम

Thursday, October 2, 2014

patathar

उसे बडा गुस्सा आ रहा था।तेल का डब्बा उठाए वो चल पङी।ये माँ हमेशा ऐसा ही करती है। पहले सामान मंगवाती हैऔर फिर भेजती है ।ये लाला भी ना हमेशा जानकर के गलत सामान ही देता है।कितनी गंदी नजर से देखता है।और सामान पकङाने के बहाने जिस तरह वो उसे छूने की कोशिश करता है।उसका मन करता है खून पी जाए।माँ को कैसे समझाऊं कि मुझे सामान लेने मत भेजा करो।पर वो भी बेचारी क्या करे।सुबह से काम पर जाती है,तब उन्हें दो वक्त का खाना मिलताहै।काश बापु दारू ना पीता।वो होता तो उसे नहीं जाना पङता दुकान पर।वो तो जहरीली दारू से मर गया और पीछे छोङ गया हमें दरिंदों के लिये।सोचते सोचते जोर की ठोकर लगी।वो गिरते-गिरते बची।पर उसे एक नई राह दिखा दी उस पत्थर ने।उसने कसकर मुट्ठी में जकङ लिया पत्थर को।और चल पङी लाला की दुकान पर ।
पूरे गांव में ये खबर आग की भाँति फैल गई।जिसे देखो उसके मुँह पर इसी चमत्कार की चर्चा थी।आस्था का सैलाब उमङ पङा था।हर एक की मंजिल बस एक ही जगह थी।लोग हार,नारियल,अगरबत्ती लिये दौङे चले जा रहे थे।जय माता जी के उद्घोश नें आसमान को गुंजा दिया था।माथे पर लाल सिंदूर लगाए,लाल चूनरी में वो बेठी सभी को दर्शन दे रही थी।भक्तों का तांता लगा था।कल तक उस पर कुत्सिक नजर डालने वाले आज उसे देवी समझ पूज रहे थे।अब वो भेङियों से सुरक्षित थी।
पर…पर तुम तो मर चुके हो ।फिर…फिर यहाँ क्या कर रहे हो।वो पसीना पसीना होते हुए बोली।मेंरी रूह को चैन ओ करार नही है,जब तक तुम मुझे माफ नहीं कर दोगी ,में भटकता रहूंगा।खुदा के लिये मुआफ कर दो मुझे।
वो झटके से उठ बैठी।ओह !क्या था ये।कुछ देर खौफजदा बैठी रही।उसे समझ नहीं आ रहा था क्या चल रहा है सब।उसके दिमाग में हर घटना चलचित्र की भांति घुमने लगी।
सामने वाले घर में रहने आया था वो।तब ये लव जेहाद नाम की चिडिया नहीं थी।एक मुहल्ले में बसने वाले कब एक दूजे के दिल में बस गए ।पता ही ना चला।दिन सुनहरे,शामें गुलाबी सी।जमाने से छुपकर प्यार परवान चढता गया।दोनों ने साथ जीने मरने की कसमें खाई थीं।सारी कसमें ,कसमें ही रह गई।
शादी का वादा,वादा भर रह गया।उसे चार दिनों के लिये अचानक बाहर जाना पङ गया।वो चार दिन उसकी दुनिया उजाङ देंगे अगर ये जानती तो कभी नहीं जाती।लौटी तो उसकी दुनिया वीरान थी।वो जैसे उसके जाने के इंतजार में ही था।उसके जाने के अगले दिन वो सेहरा बांध के दुल्हन घर ले आया।
लौटी तो समेटने लायक कुछ बचा ही नहीं था।ना खुद को समेटने की हिम्मत ही बची थी।उसने वहाँ से दूर चले जाने का फैसला किया।मां ने बेटी की सूनी आंखों को पङ लिया।
अब कुछ नहीं बचा था उसके पास जो उसे वहाँ रोकता।कमजोर नहीं थी कि जान दे देती।जब वो जी सकता हे तो में क्यूं नहीं।बिना एक भी आंसु टपकाए वो बङी बहन के घर आ गई।छोङ दी वो दुनिया जहां उसका दिल धङकता था।उसके सामने रहकर ना वो खुद को कमजोर करना चाहती थी ना उसे ग्लानी का अहसास कराना चाहती थी।उसने तो एक बार भी पूछने की कोशिश तक नहीं की कि आखिर तुमनें ऐसा क्यूं किया।नए शहर में खुद को काम में झोंक दिया।भूली नहीं थी उसे पर याद भी नहीं करती थी।बस शादी कभी ना करने का फैसला कर लिया।उसके बाद कभी लौटी नहीं उन गलियों में।
कुछ सालो बाद पता चला किसी नें उसे गोळी मार दी और वो वहीं मर गया।लौटने की हिम्मत तब भी नहीं बची थी।पर आज अचानक…उसने उन गलियों में लौटने का फैसला किया।
बरसों बाद जब उन गलियों में कदम रखा।उसके पैर कांप रहे थे।जी चाह रहा था।उलटे कदम लौट जाए।कांपते कदमों से उसकी कब्र पर जाकर अपनी अकीदत के फूल चढाए।मेंने तुम्हे माफ किया जावेद…बरसों से दिल में जमे आंसू पलकों का तट बांध तोङ चले।वो फूटफूट कर रो पङी।मैंने तुम्हें माफ किया …माफ किया जावेद…और उसके प्राण वही उङ गए।

फिर संवरना चाहती है…


बिखरी -बिखरी सी ज़िंदगी
फ़िर सवरना चाहती है …
कई छुपी हसरतें है
जो पूरी होना चाहती है …
अनदेखे.अनछुवे ख्वाब की
ताबिर चाहती है …
लबों से लब जुङें ना भले
थामकर हाथ उनका
मंजिल पाना चाहती है…
ये तंहाई,ये गैरत मंदी
इनसे छुटकारा चाहती है…
ये गम की रात,है बङी लंबी
अब इक नया सबेरा चाहती है…
बिखरी-बिखरी सी जिंदगी
फिर संवरना चाहती है…

कभी कभी शब्द
खो देते हैं अपने मायने
अपने होने का अर्थ
हम पुकारते रह जाते हैं
पर आवाज़ कहीं गुम हो जाती है
पहुचती नही लोगों के कानों तक
या शायद भुल जाती है
गले से निकलना
या खो जाती है
किसी अंतहीन गली के
अंतहीन सिरों में …
तो इन शब्दो के मायने ही क्या
क्यू हैं ये हमारी ज़िंदगी में
मिट क्यू नही जाते ये
तब ना होगी पुकार
न होगा दंश
की किसी ने नहीं सुनी पुकार
तब
नही खोएंगे शब्द
अपना अर्थ
अपने होने के मायने
ओ शब्द तुम खो जाओ

Wednesday, September 24, 2014

हमारे होने का मतलब ...


तुम्हारे या मेरे नहीं
बल्कि
हमारे होने का मतलब
जैसे 
क्षितिज पर
आसमा से
मिलती
धरा …
जेसे
मेरे केशों में
उलझी
वो
तेरी उंगलियां…
जैसे
वो लम्हे
जो नही कर
सकती
मैं बया ….
तुम्ही कहो
सच है ना …

वक़्त


मम्मा .मैं क्या खाउं समझ ही नहीं आ रहा।

जो मन करे खालो बेटा।इतनी चीजें तो रखीं हैं फ्रिज में।
तभी तो माँ कुछसमझ नहीं आ रहा।गुडिया नें प्यार से उसके गळे में अपनी बाहें पिरोते हुए कहा।
उसे अनायास अपना बचपन याद आ गया।जब वो छोटी थी।पिता की असमय मृत्यु ने उनहे सडक पर ला खडा कर दिया था।कहने को लंबा चोडा परिवार था।मां की सगी बडी बहन जो उनकी जेठानी भी थी।वो बगल वाले कमरे में ही अपनें बच्चों को मिठाईयाँ खिलातीं और उनकी छोटी बहन के घर कई दिनों तक खाना नहीं बनता था।मां आटा सेक कर उन बहन भाईयों को खिला देती।खुद भूखी रहती।पडोसियों को दिखाने को साफ बरतन ही फिर साफ करने बैठ जाती ।पर कभी ना खुद ने किसी के सामने हाथ फैलाए ना अपने बच्चों को हीन भाव महसूस होने दिया।
आज मां की मेहनत के फलस्वरूप वो इस लायक हे कि उसके बच्चों के पास सब कुछ हे।पर एक वो वक्त भी था।उसकी आंखो से आंसु टपक पडे।.

फेकबुक


पिछले 15 दिनो से वो बहुत बैचेन थी.ना दिन को चैन ना रातों को करार था।थक गई थी वो।किसे बताए,कैसे समझाए अपने अंदर की तङप को।कोई समझने वाला भी तो हो।उसने करवट बदलकर सोने का प्रयास किया।पर अपने अंदर चलते विचारों के प्रवाह ने उसे सोने ना दिया।उसने मोबाइल की तरफ हाथ बढाया।ना कोई कॉल था ना मैसेज।क्या करे।किसी से बात करके अपने मन को हल्का करना बहुत जरूरी लगा।सिर्फ एक ही व्यक्ति हे जिसे वो कॉल कर सकती हे।उसने एक नजर घङी की ओर डाली।12बजकर 15 मिनट हो रहें हैं।अभी जाग ही रहा होगा।हमेशा की
 तरह फेकबुक पर लगा होगा।फेक लोगों के साथ।हंह।ये फेकबुक भी अजीब शय हे।जो वास्तविक रिश्ते हैं उनसे तो कोसों दूर कर देती हे और जो आभासी हैं उनके करीब ले आती हे।
रहनें देती हूँ ।नहीं डिस्टर्ब करती।सोचकर मोबाइल को फिर रख दिया तकिये के नीचे ओर सोने का असफल प्रयत्न करने लगी।एक वक्त था।जब भी नींद खुलती ,उसके मोबाइल पर कोई ना कोई मैसेज जरूर होता था।अब तो अरसा हुआ।कोई मैसेज नहीं करता।आखिर वो उठ बेठी।मोबाइल उठाया नम्बर ,वो तो मिलाना ही नहीं होता।बस एक यही तो हे जिससे बात करती हे वो।वरना दोस्त तो बनाए ही नही उसने ।
झिझकते हुए उसने कॉल किया।काफी देर बाद उधर से कॉल अटेंड किया।सो रहा हूँ।
मुझे बात करनी हे।नींद नहीं आ रही।
सुबह बात करेंगे अभी सो जाओ।तो मुझे सुला दो।फिर सोना।
उधर लम्बी खामोशी।सुला दो ना।प्लीज ।सो जाओ यार।
मन दरपन कहीं चटक सा गया।ये वही हे जो आधी रात को कॉल करता तो उसका कॉल अटेंड करना जरूरी होता था।ओर आज जब उसे जरूरत हे तब …जिसके पीछे कभी नींद ,भूख-प्यास,रात-दिन कुछ नहीं देखा।जिसके कारण अपनी मानसिक शांति ,अपना दोस्त सब गंवा दिया।आज वही,एक गहरी साँस ली उसने।नकाब उतरते देर नहीं लगती यहाँ।चेहरों से नकाब जल्दी ही उतरने लगते हैं।वो फिर से सोने का उपक्रम करने लगी।पर बैचेनी चरम पर थी।उसका हाथ फिर मोबाइल की ओर बढा।क्या में तुम्हे कॉल कर सकती हूँ।तुम्हारे प्यार को सिर्फ इसलिये स्वीकार नहीं किया था कि कहीं तुम्हे खो ना दूँ।पर तुम्हे सिर्फ दोस्त बनकर रहना गवारा ना था।ओर जिस कारण से तुम्हें खोना नहीं चाहा था।उसी कारण से तुम्हे खो दिया।मोबाइल की तरफ बढता हाथ ,थम गया।तुम भी नहीं समझोगे।अगर समझते तो यूँ दूर नहीं जाते।कुछ पल सोचती रही।अंत में आखिर वो भी फेकबुक की दुनिया में खो गई।

सृजन


कुछ यादें ,शीशों सी होती हैं
जब कभी उभरती हैं ज़ेहन में
कभी धुंधली ,कभी चमकदार
कभी डूबती ,स्याह अन्धेरो में
कभी टूटे शीशे की किरचो सी 
चुभती.दंश देती …
उफ्फ,कितनी तंज,कितनी बेसब्र
चली आती हैं ,वक्त - बेवक्त
दस्तक भी नही देती कमबख्त…
सुनो ना ,इन यादों को टांक दो
चांद तारों की तरह
अब इनमे देखना नही चाहती मैं
अपना अस्तित्व …
बल्कि
खुद सृजन  करना चाहती हूंखुद को ….

आईना



ड्राइवर ने तेजी से बस को ब्रेक लगाए.बस के पहिये चरमराहट की आवाज़ करके दूर तक घिसटते चले गऐ.बस का तेज झटका लगने से उसका माथा आगे वाली सीट से जा टकराया ओर वो पीडा और दर्द से कराह उठी .ड्राइवर की तरफ़ उसने गुस्से से निगाह डाली.तभी उसकी नजर ड्राइवर के केबिन के उपर लगे आइने पर पडी.दो जोङी आँखे उसी को निहार रही थी।वो अपनी चोट और दर्द को कुछ पल के लिये भूल बेठी।हडबडाकर उसने अपनी नजर बस की खिडकी के बाहर घुमा ली।उसकी गोद का बच्चा कुनमुनाया।उसने धीमें से बच्चे को सहलाया।वो पसीने से लथपथ हो रही थी।समीप ही बच्ची उसकी गोद के बच्चे के पैरों पर सर रखकर सो रही थी।उसने आहिस्ता से उसका सर सरका कर उसे सही तरह से सुलाया।धीरे से उसकी नजर फिर आईने पर गई ।वो दो जोडी आँखे अब भी उसी पर टिकी थी।

--------------------------------------------------------
उसने फ़िर हड़बडाकर नज़रे चुराई.गर्मी के उदास दिन और बस का लंबा उबाऊ सफ़र .उसे उकताहट होने लगी .तभी बच्ची कुन्मुनाई.उसने अपने पल्लू से बच्ची को हवा करी .तभी एक धचके से बस चल पडी.ना चाहते हुए भी उसकी नज़रे फ़िर उस आईने की तरफ़ उठ गई.वो एक जोडा आंखे अब भी उसी पर टिकी थी.उसने अचकचा कर नज़रे घुमाई.वो असहज महसूस करने लगी .ऐसा नही था की वो उन नज़रो को जानती नही थी.वो उस शख्स को पहचानती थी.पर उसका इस तरह देखना अजीब सा एहसास करा रहा था.तभी गोदी का बच्चा रोने लगा.उसने पलट कर हर तरफ़ निगाह फेरी ,कही उस बच्चे की मा नज़र आ जाए.बस मे मस्ती और शोरगुल हो रहा था.एक तरफ़ दूल्हा अपने दोस्तो के साथ गप्पे मार रहा था.कुछ लड़के -लड़कियां अन्ताक्षरी खेल रहे थे.कोई ऊंघ रहा था.ओह हां ,वो ये बताना तो भूल ही गई की वो अपने पडोसी लड़के की बरात मे जा रही थी.और दूल्हे के हर दोस्त को जानती थी.अब उसकी नजरे बच्चे की मा को तलाश कर ही रही थी के बस फ़िर रुकी .बच्चे का रोना तेज होता जा रहा था.दूसरी बच्ची भी रोने की आवाज़ से जाग गई थी.तभी बच्चे की मा ने आकर बच्चे को उसकी गोद से लिया .उसने राहत की सांस ली.उसके हाथ दर्द करने लगे थे.कुछ समय के लिये वो उन आंखो को भूल गई थी.पूरी बस खाली हो चुकी थी.सभी खाना खाने के लिये उतर गऐ थे.उसने खडे होकर अपने अस्त व्यस्त कपडे ठीक किये .तभी बच्ची बोली पानी पीना है .उसने चारों ओर नज़र दौडाई किससे कहे पानी लाने को.उसने खिड़की से बाहर झांका.सभी दूर नाश्ते की दुकान पर खडे थे.कोई चाय पी रहा है .कोई नाश्ता करने मे मश्गुल है .तो कोई सिगरेट के धुवे मे खोया है .तभी वही नज़रे नज़र आई .अब उसे बोलने के सिवा कोई और चारा ना था.उसने कहा पानी ला दो.गुडिया को प्यास लगी है .वो नज़रे मुस्कूराती हुई उसकी नजरो से ओझल हो गई.थोडी ही देर बाद वो पानी की बोतल और कुछ खाने की चीजे लेकर भागता हुआ आया और उसके हाथो मे थमा कर ,उसके कुछ कहने से पहले गायब हो गया .वो हाथ मे पेसे लिये उसके लौटने का इंतज़ार करती रही .शायद वो नही चाहता था की किसी को इस बात का पता चले.उसने गुडिया को पानी पिलाया और दोनो ने उसका लाया हुआ नाश्ता किया .तभी बस मे सारे बाराती लौटने लगे .पर वो नही लौटा जिसका उसे इंतज़ार था .

----------------------------------------------------------
बस अपने गनतव्य स्थल पर पहुच गई थी।पर वो एक बार भी नहीं दिखा।बस से उतरने के लिये वो जैसे ही खङी हुई।देखा पीछे की सीट पर बेठा वो उसी को देख रहा हे होंठों पर शरारती मुस्कान सजाए।वो चूपचाप बस से उतर गई।सभी अपना सामान थामे वहाँ चल दिये जहाँ बारात को ठहराया था।द्वार पर स्वागत की रस्म के बाद सारे बाराती उत्साह और कोलाहल के साथ आराम के मूड में आ गए।जलपान का दौर और बारातियों की आवभगत के बीच बारात में मौजूद लङकियाँ सजने संवरने के इंतजाम में लगी थी।वो इन सबसे दूर अकेली एक कमरेमें बेठी थी।बहुत शोरशराबा उसे पसंद नही।थोङा रिलेक्स होकर तैयार होकर जैसे ही कमरे से बाहर निकली,नजर सामने बाल्कनी में गई।ओह !कमरे मे लगे रोशनदान के शीशे से वो आँखे उसका पीछा करती रहीं और उसे भान भी नहीं हुआ।अजीब सी कुलबुलाहट होने लगी उसके मन में।उसने उन नजरों को नजरअदांज कर दिया।तभी बारात में मौजुद अन्य लडकियाँ उसे खींचकर ले गईं।दुल्हा घोङे पर सवार हो चुका था।उसके दोस्त अजीब अजीब तरह से डांस कर रहे थे।हर कोई मस्ती के मूड में था।बैंड पर आज मेंरे यार की शादी हे गाना बज रहा था।समां मस्ती का था।अब लङकियाँ कहाँ पीछे रहने वाळी थी।बेबी डॉल में सोने की …गाने पर लडकियाँ थिरक रहीं थी।नोट उबारे जा रहे थे।वो भी मुस्कुराती हुई आनंद ले रही थी।अचानक गाङी के तेज हॉर्न की आवाज से हङबङाकर वो पीछे हटी।गाडी हॉर्न बजाती हुई आगे नीकळने लगी।गाडी के आईने से वही आँखे उसकी आँखों से चार हुई।उसका दिल बहुत तेजी से धडकने लगा।बारात द्वार पर पहुँच गई।जयमाल के बाद दुल्हा दुल्हन स्टेज पर बैठ गए।उसे भी दुल्हे की भाभी ने जबरदस्ती स्टेज पर बेठा दिया।वहीं एक ओर दुल्हन को देनें वाला दहेज का सामान रखा था।जिनमें एक आलमारी और ड्रेसींग टेबल ,पलंग और अन्य सामान रखा था।साइड में डी,जे,की धून पर कुछ दोस्त थिरक रहे थे।दुल्हा दुल्हन को मिलने वाले गिफ्ट्स और लिफाफों को सम्भालते हुए अनायास नजर आलमारी पर पडी तो वो हकबका गई।आलमारी में लगे आईने से वही आंखे उसे निहार रही थी।कुछ पल के लिये उसे समझ नहीं आया वो क्या करे ।फिर वो उठकर दूसरी साइड जा बेठी।उसने देखा वो आँखे वहाँ से ओझल हो चूकी थी।उसने गहरी राहत की साँस ली।वैसे सच कहे तो उसे भी उसका इस तरह निहारना सुखद अनुभूति दे रहा था।पर वो ये जताना नहीं चाहती थी।अब रह रहकर उसकी नजरें उसे तलाश कर रहीं थी।पर वो ना जाने कहाँ गायब हो गया था।अब बैचेन होने की बारी उसकी थी।वो बडी ही बैचेनी से उसे तलाश करने लगी।पर वो तो जैसे एकदम गायब ही हो गया ।
-------------------------------------
वो बङी बैचेनी से अपनी नजरे चारों और फेरती रही।पर वो कहीं नजर नहीं आया।झुंझलाते हुए आखिर वो कुर्सी से उठ खङी हुई।स्टेज से नीचे उतरने को जैसे ही कदम बढाए तो नजर वहाँ रखी ड्रेसिंग टेबल पर पडी।आईने मे उसका अक्स नजर आया।उसका पारा सांतवे आसमान पर पहुंच गया।जिसके लिये वो इतनी बैचेन हे वो इस तरह बैठकर उसके मजे ले रहा हे कि वो तो उसे देख पाए पर पता भी ना चले।गुस्से में पैर पटकती वो वहाँ से रूम में चली आई।खुद को शांत किया।कपडे बदले ।गेट खोलकर जैसे ही बाहर नीकळी वो कान पकडे सर झुकाए बाल्कनी में खडा था।अब वो समझ नहीं पा रही थी क्या करे।वो अनदेखा करके वहाँ चल दी जहाँ दुल्हा दुल्हन खाना खाने बैठे थे।वो तुरंत उसके लिये कुर्सी ले आया।अब वो जानकर के दूसरी कुर्सी पर जा बेठी।वो कान पकडे उसके लिये खाने की प्लेट ले आया।उसकी इस हरकत पर उसे हंसी आ गई।उसने बडे प्यार से उसे खाना खिलाया।उसके दोस्तों ने उसका बडा मजाक बनाया।यार !तु बाराती हे।चल आ तु भी खाले।पर उसके खाना खाने के बाद ही वो खाना खाने बेठा।अब बारी आई फेरों की।वो दोनों इस तरह बैठे की एक दूसरे को सीधे ना देख पाएं।आईना जो था उनका मददगार।या कहें की उनके प्यार की इस आँख मिचोली का राजदार ,आईना ही था।अपने में सारे राज छुपाए वो इस पनपने वाले प्यार का मूक गवाह था।दोनों का ध्यान शादीमें नहीं बल्कि एक दूसरे को कनखियों से निहारने में था।पूरा वक्त यही खेल चलता रहा।गहराती रात के साथ उनका प्यार भी गहराता जा रहा था।सप्तपदीके फेरो के साथ जैसे उनका मन भी फेरे ले रहा था।एक नया उत्साह,उमंग मन में हिलोरे ले रहा था।अब आई बिदाई की बारी।उन्हें लगा जैसे वो ही बिदा हो रहें हो।क्यूं ये घडी इतनी जल्दी आ गई।काश् वक्त थोडा थम जाता।जानते थे बस जैसे ही दुल्हे के घर पहुँचेगी उन्हे जूदा होना पडेगा।ना कोई बात हुई अब तक ना इजहारे मोहब्बत ही हुई।पर नजर ही नजर में सात जन्मों के वादे हो गए।समय इस लुकाछिपी मे कैसे बीत गया पता ही ना चला ओर बस दुल्हे के घर पहुँच गई।एक शोर सा मच गया।दुल्हन की आगवानी में सब जुट गए।वो भी अपना सामान लेकर बोझिल मन से अपने घर की ओर चल दी।अब तक का सारा उत्साह खतम हो चुका था।
अगली सुबह मन में फिर एक उमंग थी।आज पार्टी में वो फिर उसे देख पाएगी।पूरा दिन उसने शाम के इंतजार में बिताया।शाम को बडी उमंगों के साथ उसने विशेष श्रंगार किया।आईने मे खुद को देखा तो खुद ही मुग्ध हो गई अपने आप पर।उसने पर्स में कुछ श्रंगार का सामान और एक छोटा सा आईना रख लिया।
पार्टी अपने पूरे यौवन पर थी।चारों तरफ कहकहे गुंज रहे थे।डी•जे•पर कुछ लडके थिरक रहे थे।कुछ मेहमान खाना खाने में लगे थे।कुछ स्टेज पर थे।बच्चे मस्तीयाँ कर रहे थे।आज फिर उसे दुल्हा दुल्हन के साथ स्टेज पर बैठना था।आज यहाँ कोई आईना नहीं था।उसकी नजरें हर ओर उसे तलाश रही थी पर वो कहीं नहीं था।वो उदास सी बैठी थी।मन कहीं नहीं लग रहा था।तभी वो सामने से आता दिखा।उसका
रोम रोम खिल गया।बदन में जान आ गई।चेहरा खुशी से दमकने लगा।
पर उसने एक बार भी उसकी तरफ नजर उठा के नहीं देखा। ऐसा किया जैसे जानता तक ना हो।उसे समझ नहीं आ रहा था आखिर वो ऐसा क्यो कर रहा हे।उसकी बैचेनी बढने लगी।वो भीड में ना जाने कहाँ गुम हो चुका था।वो इंतजार करके थक गई।फूल सा चेहरा कुम्हला गया ।तभी स्टेज पर दुलहन के लिये कॉफी लाई गई।वो जैसे ही पीने लगी कि हडबडी में उसके कपडों पर ढुल गई।वो दुलहन को लेकर उसका मेकअप और कपडे ठीक करने का बहाना करके स्टेज से उतरी। वहाँ से उतरकर उसने राहत की साँस ली।वो दोनों एक कमरे की तरफ बढे।वहाँ उसने दुलहन के कपडे साफ करे और मेकअप सही करने के लिये पर्स से सामान निकाला।आईना हाथ में लिया ही था कि बाहर से कुछ ठहाकों की आवाज आई।उसका ध्यान गया।यार ! आखिर तु शर्त जीत गया।घास नहीं डालती थी किसी को भी।आखिर तुने उसका घमंड तोड ही दिया।दोस्त उसकी पीठ थपथपा रहे थे।आईना उसके हाथ से गिरकर टूकडे हो चुका था और उसका दिल भी ……!!

उलझन


क्या
बहती नदी
का प्रवाह मोड़ना मुमकिन है ?
क्या
बहती हवाओं 
को बांध पाना मुमकिन है ?
इस
बहते प्यार को केसे बांधूं ?
समझ नहीं पाती हूँ |
……………………

अजीब उलझन हे
ना तुम दूर जाते हो
ना करीब आते हो
इतनी कश्मकश
क्यों दे जाते हो
इतनी बैचेनियाँ
इतनी तङप
यही देना हे
फितरत तुम्हारी
इक बार
ये खुद ही पर
क्यूँ नहीं
आजमाते हो
( शायद तब
समझ सको
मेंरी इस तकलीफ को
जब तुम खद
गुजरो इस दौर से
इन आँसुओं के
समन्दर से
जो अभी बकौल
तुम्हारे ,चंद
बूँदें हैं पानी की )

--------------------

ए जिंदगी


ए ज़िंदगी
चल
खरिदते बेचते
हैं
थोडी खुशियां थोडे ग़म …
कर के
निलामी
सारी उदासियों की 
खरीद लाते
हैं
सारी खुशियां  हम …

दो मुटठी आसमा




वो
क्यू ना
समझ सका
मेरी बेचेनियो को
उदासियों को
ज़िंदगी
फेंकती रही
अन्धेरे उजाले
वो
क्यू ना
समेट सका
मेरे लिये
दो मुटठी
आसमा

अतीत के झरोखे

वक्त के
समन्दर मे
छोड़ जाना
चाहती हूं
अपने कदमों
निशान …
कुछ छाप
कुछ स्मृतियां
जो कभी
विस्मृत ना हो
………………………………
जब भी तुम झांको
अतीत के झरोखे मे
मैं आ खडी होउं
अपने संपूर्ण
अस्तित्व के साथ
मेरी वाचालता
मेरी अनंत इच्छएं
जो तुममे
समाहित कर
दी हैं मेने
अब तुम्हे
जीना है
मैं बनकर
कहो
जी सकोगे …

..............................

कहाँ गुम


हैरान हू
ओर
परेशान भी
कोई अक्स क्यू नही
उभरता…
जबकि यूं तो
तेरी यादें…
हर वक्त डेरा
जमाए रहती हैं
मेरे दिल
के आंगन मे …
ओर अब
कहा हुए गुम
तुम
अपनी यादों को
समेट के …
.…शायद
अब तेरा
लौटना
मुमकिन नही …

लाल रंग वो शोखी का


उसका मन किया आइने मे खुद को निहारने का .पर घर मे अभी पूरा परिवार है .वो सबके जाने का इंतज़ार करने लगी .आखिर जब घर का प्रत्येक सदस्य घर से चला गया .उसने दरवाजे पर सांकल चढाई .क ई दिनो से छिपाकर रखी पिटारी खोली .और फ़िर एक एक करके अपने अरमानो के रंगो मे खुद को रंगने लगी .चुडी .बिन्दिया .लिप्स्टिक .महावर …ओर अंत मे बारी आई गहरी लाल शोख चुनरिया की .ओढकर वो आइने के सामने खड़ी हो गई .एक गहरी नज़र खुद पर डाली .क्या कमी है उसमे ?फ़िर …फ़िर क्यू आखिर …दो बुंद आंखो से छलक पडी.उपर उपर सब क
ुछ कितना शांत ओर सुखद दिखाई देता है ,पर अंदर ही अंदर कितना कुछ …उसकी तमाम इच्छाएं अपना दम तोड़ चुकी hain.और बगावत की सज़ा उसे तालो मे कैद करके दी गई .कभी कभी खुद को आइने मे देखकर ही अपना अस्तित्व तलाशती है .अब तो जेसे आइना ही उसका साथी बन गया है .जो उसके असली चेहरे ओर अस्तित्व को खामोशी से सम्भाले रखता है ओर किसी को भनक भी नही लगने देता .आखिर वो कब तक ऐसे जियेगी .अपने अरमानो की चिता कब तक जलती देखेगी .मन ही मन उसने फ़ैसला किया .खुद को फ़िर एक बार आइने मे निहारा .पंखे पर वही शोख लाल चुनरी बान्धी ओर झूलने ही जा रही थी कि तभी उसे एक झटका सा लगा .क्या करने जा रही है वो .अब वही शोख लाल चुनर ओढ वो निकल पड़ी.अपने अरमानो को पूरा करने .…

नमक


नीरा अकेली ही जोर से हंस दी ।उसे यूँ हंसता देख आसपास बैठे सभी लोग उसे अचरज भरी निगाहों से देखने लगे।नीरा सभी को इस तरह अपनी ओर ताकता देख झेंप गई।उसे वो बात याद आ गई ।जब अमन ने उसे गहरी नींद से जगाया था।

मोटू ,ए सुन ना ।मझे भूख लगी हे ।अमन ने नीरा को जगाते हुए कहा ।
तो किचन में से लेकर खा लो ना।मुझे सोने दो ।नीरा करवट बदलते हुए बोली।
नहीं तुम लाओ।
यार क्या हे ।अब इस वक्त भूख लगी हे तुम्हे भी।टाईम देखो ना।रात के 2 बज रहें हैं ।मुझे सोने दो और तुम भी सो जाओ ।नीरा अमन को करीब खींचते हुए बोली।
नहीं मझे नींद नहीं आ रही ।कुछ बना दे ना मोटू ।अमन ने लाड जताते हुए नीरा को कंधे से फिर हिलाते हुए कहा।
ओहो तुम भी ना ।इस वक्तअन्डों के सिवा कुछ नहीं हे ।ऑमलेट बना देती हूँ।नींद से बोझिल पलकों को मिचमिचाते हुए नीरा किचन में घुस गई।
लो खा ओ ।अब में सो रही हूँ ।ऑमलेट की प्लेट अमन को पकडाते हुए नीरा ने सोने का उपक्रम करते हुए कहा ।
सुन ना ।बैठ ना मेंरे पास ।अमन नें नीरा
को करीब खींचा और ऑमलेट खाने लगा । दो कौर खाए और बोला-नीरू,
हम्म नीरा ने आँखे खोली।अब क्या हे ।जल्दी से खाओ ।फिर सोते हैं ना।
इसमे नमक तो डाला ही नहीं तुमने।
अरे ,डाला तो था ।कहते हुए नीरा ने खुद चखने को हाथ बढाया ।
रहने दो ।मैं यूंही खा लुगाँ ।
नीरा ने जैसे ही चखा।दौडकर वाशरूम भागी। अमन इतने नमक वाला तुम कैसे खा रहे हो।छोडो।
कैसे ना खाता मेरी मोटू ने इतने प्यार से जो बनाया है ! नीरा ने नींद के झोंके मे जरा ज्यादा ही नमक डाल दिया था ! और फिर दोनो बेसाख्ता खिलखिलाकर देर तक हंसते रहे ।

नीला आसमान


नीली 

आसमानी चादर 
सा 
प्यार तेरा .
लपेटना चाहती थी 
अपने
इर्द गिर्द
जो
बरसता रहे
एक सा…
पर
बदल गए
हो
तुम
और
बदल गया
हे नीले
आसमान
सा प्यार
तुम्हारा …

श्रेणी लेखन की या लेखिका की ...



देखो .मैं तुम्हे एक बडी पत्रिका मे उप सम्पादिका बना दूंगा । साथ ही एक बङे पेपर में डेली कॉलम लिखने के लिये अनुबंध दिलवा दूंगा । और नही मानी तो...तुम जानती हो, तुम्हारे लेखन का यही अंतिम पड़ाव होगा | बस मेंरी बात मान लो । ये कहते हुए कई पुस्तकों के लेखक , जाने- माने विद्वान प्रोफेसर साहब ने बङी ही ढिटाई से उसका हाथ पकङकर अपनी ओर खींचकर अपने तपते हुंए होंठ उसके होंठों पर रख दिए । उसने घबराकर खुद को जैसे- तैसे उनकी गिरफ्त से आजाद किया और बिना कुछ बोले अपने लिखे हुए सारे आर्टिकल 
और कहानियाँ वही छोड़कर दरवाजे की ओर दौङ लगा दी | घर आकर घंटों रगड़ कर नहाती रही | पानी की तेज धार के साथ उसके अश्रु भी बह रहे थे | उसे घिन आ रही थी उस घटिया आदमी पर | कई दिनों तक अपने होंठों पर उस लिजलिजे स्पर्श को महसूस करती रही | तब उसमे इतनी हिम्मत भी नही थी की किसी को ये बात बताती | बताती भी तो सवालों के घेरे में सबसे पहले वही आती | उसने खुद को खामोश कर लिया | कई साल तक कुछ नही लिखा | कई बार अपने लिखे आर्टिकल और कहानियों की पेपर कटिंग को देखकर आंसू बहाती | फिर एक नई हिम्मत कर के उसने कई सालों बाद फिर लेखन शुरू किया | आज अपने लेखन पर अपने ही सबसे अच्छे दोस्त की टिप्पणी सुनकर वो घाव ताजे हो उठे जो इतने सालों से उसने अपने भीतर दबा रखे थे |
आज पन्द्रह साल बाद वो सोच रही थी ।अगर तब वो उस प्रस्ताव को मान लेती तो आज बङी लेखकाओं में उसका नाम शामिल होता । तब उसे ये कभी नही सुनना पङता कि आप निम्न श्रेणी की लेखिका हो । सोचते हुए कुछ बुंदें आंसुओं की अनायास टपक पङी । पर उसे इस समझोते का कोई गम नहीं था ।

वैसे आप कहाँ से ...


नमस्कार ...कैसी हैं आप ?

*जी नमस्ते , मैं अच्छी हूँ |
आपको पहले कभी देखा नही |
*जी में यहाँ नई आई हूँ ,अनुराधा मेरी फ्रेंड है |
अनुराधा ? कौन अनुराधा ...अच्छा...अनु ..हा हा हा ,भाई हम तो उसे इसी नाम से जानते हैं |
इसलिए नाम सुना तो पूछ बेठा कौन अनुराधा, माफ़ कीजियेगा |

जी, कोई बात नही |
आपने कुछ लिया ?
जी बस, अभी लेती हूँ |
आप बुरा न मानें तो एक बात पुछू ?
जी पूछिये
बोली से तो,आप गुजराती लगती है | वैसे कहाँ से हैं आप ?
एक पल को चुप रहने के बाद वो बोली ,मेरी पहचान एक भारतीय के तौर पर कीजिये ,क्या फर्क पड़ता है की में किस किस जाति . धर्म या प्रान्त से हूँ....
हा हा हा...क्या खूब कहा आपने |
श्रीमान जी खिसियानी हसी हस कर चल दिए | उसके बाद वो पलटकर एक बार भी नही आए |
.....................................................................

एक अदद तस्वीर



शाम गहराती जा रही थी.सूरज अपनी लालिमा के साथ अस्ताचल को चला था.उसके दिल मे भी शाम के साथ अंधियारे घिरते जा रहे थे । डूबते सूरज के साथ उसका दिल भी डूबता जा रहा था । किसे और केसे कहे अपनी बैचेनी । चारों ओर गहन अंधकार के सिवा कुछ भी नजर नहि आ रहा था । वो एक गहरी सोच में डूब गई । उसने कमरे में नजर दौङाई । पूरा घर उसकी मुस्कुराती तस्वीरों से भरा पङा है । हर कमरा उसकी मुस्कुराहटों और कहकहों से महकता था । आज वहाँ सिर्फ तस्वीरें गुलजार हैं । सिर्फ तस्वीरें । पर क्या सच में वो है अब भी…इन तसवीरो से इतर …या उसका अस्तित्व अब सिर्फ इन तस्वीरों में ही बचा था । वो उठी और अपनी अटैची पैक करने लगी । वो सिर्फ एक तस्वीर बन कर नहीं जियेगी ।

शून्य



जिंदगी क्या है 
शून्य के बाद
एक और शून्य में
उतर जाना ...
तिशनगी क्या है
एक खाली
भँवर  में
खो जाना ...
बंदगी क्या है
तेरे प्यार में
सिर्फ तेरा
हो जाना ...
तो फिर
मेरा क्या है
सिर्फ वही
एक शून्य
जिसे पाटने के लिए 
बना लिया
एक और बड़ा
शून्य ...
अपने चारों ओर
ना कोई परिधि
ना कोई वृत्त
ज़िन्दगी सिर्फ
तेरे लिए
तेरे ही  लिए ....
और जब  तू खो जाए
किसी और का हो जाए
तब मेरा क्या रहा
 मैं तुझसे भी गयी
और खुद से भी ...
बता ए जिंदगी
शून्य में बढ़ा क्या
इस शून्य से घटा क्या
बस शून्य में ही
डूब कर रह जाना है ...
ना खुद को
पाना है
ना किसी और का
हो जाना है ....
तो जाऊं कहाँ
कशमकश
उलझन
न कोई राह
ना कोई डगर ....



पढ़ा लिखा गंवार


यूँ वो कोई अनपढ़ नही थी | बारहवीं क्लास पास थी | माँ पिता ने शादी कर दी | आगे पढने का सपना –सपना ही रह गया | पिछले तीन साल से उसका पति प्रशासनिक सेवा में जाने की तैयारी में लगा था और वो लगी रही अपने पति के हर सपने को पूरा करने में अपना मन मार पति को और आगे पढने बड़ा अफसर बनने के सपने के लिए उसने खुद को होम कर दिया | रात दिन पति की देखभाल में लगी रहती | पति के खाने –पिने ,कपड़े लत्ते से लेकर रिश्तेदारी की पूरी जिम्मेदारी उसने अपने नाजुक कन्धों पर उठा ली थी | | कई बार उसका भी मन क
रता वो भी अपने पति के साथ वेसा वक़्त बिताए जैसे और पत्नियाँ बिताती हैं | पर ये सब तो जैसे उसके लिए एक सपना सा था | जब भी पति के करीब जाने का मन होता देखती पति पढाई में व्यस्त है | वो ख़ामोशी से कदम दर कदम बस पति का साथ देती रही | आखिर उसके पति की मेहनत रंग लाई और उसका सिलेक्शन हो गया | साल भर की ट्रेनिंग के बाद ....बड़ी पोस्ट बड़ी जिम्मेदारी ...पहले अपनी पढाई के कारन वो पत्नी पर ध्यान नही दे पाता था और अब...अब उन्हें अपनी पत्नी को पत्नी बताने में शर्मिंदगी होने लगी | पत्नी के साथ कही आने जाने में शर्म का एहसास होने लगा पत्नी की कम पढ़ी लिखी होने का एहसास उसके करीब जाने से रोकने लगा | धीरे-धीरे वो अपनी पत्नी से दूर होते गए ...पर पत्नी अब भी उतनी ही निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्त्तव्य निभाती रही ...| कुछ दिनों बाद पता चला उन्होंने अपनी एक सहकर्मी के साथ रिलेशन बना लिए हैं | पढ़ी लिखी सहकर्मी के सामने पत्नी और फूहड़ और गंवार लगने लगी ...कोई बताए इनमे कौन ज्यादा एजुकेटेड साबित हुआ .....

जीवन का जुगाड़


उसने तीन बार पैसों को गिना और हर बार वो निराश होकर रख देता |
सच कितना मुश्किल है इस महंगाई में गुजर करना |उसे हर बार मन मारना पड़ता है |जब भी दोस्तों को देखता है उसे लगता है काश वो भी किसी रईस माँ-बाप का बेटा होता ;तब उसे इस तरह कदम कदम पर अपनी इच्छाओं का दमन नही करना पड़ता |और नही तो ईश्वर किसी माध्यम वर्गीय परिवार का हिस्सा भी बना देता तो चलता ...पर गरीब का बेटा होना सबसे बड़ा अभिशाप है | उसने पिछले कई सालो से अपने आपको यूपीएससी की तैयारी में झोंक रखा था |एक ही लक्ष्य है प्रशास
निक अधिकारी बनने का |इसी सपने को लेकर उसने खुद को किताबो की दुनिया में कैद कर लिया था |कई-कई दिन तक वो अपने कमरे में किताबों में खोया रहता |ना खाने की फ़िक्र ना अपने शरीर की |कई बार तो दाढ़ी का जंगल उग आता उसके चेहरे पर | उसे दाढ़ी बनाने का भी भान नही रहता |माँ किसी तरह चार हजार रुपया महिना भेजती |जिसमे मकान किराया ,कॉपी-किताबों का खर्च और खाने का खर्च ,और... बड़ी मुश्किल से गुजारा होता |कई बार तो कुछ दिन भूखे रहकर दिन काटने पड़ते |पर किससे कहे अपनी व्यथा |पिछले कई दिन से उसका मिठाई खाने का बहुत मन कर रहा था |वो बार –बार अपने पास बचे हुवे पैसों को गिनता और हर बार पुनः रख लेता |यदि मिठाई खाई तो खाने की छूट्टी हो जाएगी |माह का ८ दिन और बचा है |चार बार तो भूखे ही सोया है ,और अब भी उसे दो दिन और या तो बिना खाए या चाय पर ही गुजारा करना पड़ेगा |दो मिनट के लिए उसने कुछ सोचा और स्वतः उसके कदम गुड़  के डब्बे की तरफ उठ गए |

..................................................

एक तमन्ना


नींद ना इधर है
नींद ना उधर है
और 
ख्वाब बिखरे पड़े हैं
उधार से...
ये बे-तकल्लुफ सा
कटता हुआ सफ़र...
तुम्हारी बोझिल
आँखें
मेरा टूटता सा
शरीर...
अब
जाएगा किधर ये
रास्ता ...
कहाँ होगी वो मंजिल
सुकुंपरस्ती की...
ये
ना तुम जानो
ना मैं जानू
चलो एक काम करते
हैं
बैठ के जिंदगी के
कारवें
टीप देते हैं सफ़र...
अनंत काल तक ...
बिना कुछ सोचे ...
ख्याल इतना रखना
बस
कि
तुम्हारी हथेली में
मेरी हथेली
टिकी हो बस...