Wednesday, September 24, 2014

उलझन


क्या
बहती नदी
का प्रवाह मोड़ना मुमकिन है ?
क्या
बहती हवाओं 
को बांध पाना मुमकिन है ?
इस
बहते प्यार को केसे बांधूं ?
समझ नहीं पाती हूँ |
……………………

अजीब उलझन हे
ना तुम दूर जाते हो
ना करीब आते हो
इतनी कश्मकश
क्यों दे जाते हो
इतनी बैचेनियाँ
इतनी तङप
यही देना हे
फितरत तुम्हारी
इक बार
ये खुद ही पर
क्यूँ नहीं
आजमाते हो
( शायद तब
समझ सको
मेंरी इस तकलीफ को
जब तुम खद
गुजरो इस दौर से
इन आँसुओं के
समन्दर से
जो अभी बकौल
तुम्हारे ,चंद
बूँदें हैं पानी की )

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