Wednesday, September 24, 2014

लाल रंग वो शोखी का


उसका मन किया आइने मे खुद को निहारने का .पर घर मे अभी पूरा परिवार है .वो सबके जाने का इंतज़ार करने लगी .आखिर जब घर का प्रत्येक सदस्य घर से चला गया .उसने दरवाजे पर सांकल चढाई .क ई दिनो से छिपाकर रखी पिटारी खोली .और फ़िर एक एक करके अपने अरमानो के रंगो मे खुद को रंगने लगी .चुडी .बिन्दिया .लिप्स्टिक .महावर …ओर अंत मे बारी आई गहरी लाल शोख चुनरिया की .ओढकर वो आइने के सामने खड़ी हो गई .एक गहरी नज़र खुद पर डाली .क्या कमी है उसमे ?फ़िर …फ़िर क्यू आखिर …दो बुंद आंखो से छलक पडी.उपर उपर सब क
ुछ कितना शांत ओर सुखद दिखाई देता है ,पर अंदर ही अंदर कितना कुछ …उसकी तमाम इच्छाएं अपना दम तोड़ चुकी hain.और बगावत की सज़ा उसे तालो मे कैद करके दी गई .कभी कभी खुद को आइने मे देखकर ही अपना अस्तित्व तलाशती है .अब तो जेसे आइना ही उसका साथी बन गया है .जो उसके असली चेहरे ओर अस्तित्व को खामोशी से सम्भाले रखता है ओर किसी को भनक भी नही लगने देता .आखिर वो कब तक ऐसे जियेगी .अपने अरमानो की चिता कब तक जलती देखेगी .मन ही मन उसने फ़ैसला किया .खुद को फ़िर एक बार आइने मे निहारा .पंखे पर वही शोख लाल चुनरी बान्धी ओर झूलने ही जा रही थी कि तभी उसे एक झटका सा लगा .क्या करने जा रही है वो .अब वही शोख लाल चुनर ओढ वो निकल पड़ी.अपने अरमानो को पूरा करने .…

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