Thursday, October 2, 2014

patathar

उसे बडा गुस्सा आ रहा था।तेल का डब्बा उठाए वो चल पङी।ये माँ हमेशा ऐसा ही करती है। पहले सामान मंगवाती हैऔर फिर भेजती है ।ये लाला भी ना हमेशा जानकर के गलत सामान ही देता है।कितनी गंदी नजर से देखता है।और सामान पकङाने के बहाने जिस तरह वो उसे छूने की कोशिश करता है।उसका मन करता है खून पी जाए।माँ को कैसे समझाऊं कि मुझे सामान लेने मत भेजा करो।पर वो भी बेचारी क्या करे।सुबह से काम पर जाती है,तब उन्हें दो वक्त का खाना मिलताहै।काश बापु दारू ना पीता।वो होता तो उसे नहीं जाना पङता दुकान पर।वो तो जहरीली दारू से मर गया और पीछे छोङ गया हमें दरिंदों के लिये।सोचते सोचते जोर की ठोकर लगी।वो गिरते-गिरते बची।पर उसे एक नई राह दिखा दी उस पत्थर ने।उसने कसकर मुट्ठी में जकङ लिया पत्थर को।और चल पङी लाला की दुकान पर ।

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