जिंदगी क्या है शून्य के बाद
एक और शून्य में
उतर जाना ...
तिशनगी क्या है
एक खाली
भँवर में
खो जाना ...
बंदगी क्या है
तेरे प्यार में
सिर्फ तेरा
हो जाना ...
तो फिर
मेरा क्या है
सिर्फ वही
एक शून्य
जिसे पाटने के लिए
बना लिया
एक और बड़ा
शून्य ...
अपने चारों ओर
ना कोई परिधि
ना कोई वृत्त
ज़िन्दगी सिर्फ
तेरे लिए
तेरे ही लिए ....
और जब तू खो जाए
किसी और का हो जाए
तब मेरा क्या रहा
मैं तुझसे भी गयी
और खुद से भी ...
बता ए जिंदगी
शून्य में बढ़ा क्या
इस शून्य से घटा क्या
बस शून्य में ही
डूब कर रह जाना है ...
ना खुद को
पाना है
ना किसी और का
हो जाना है ....
तो जाऊं कहाँ
कशमकश
उलझन
न कोई राह
ना कोई डगर ....
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