देखो .मैं तुम्हे एक बडी पत्रिका मे उप सम्पादिका बना दूंगा । साथ ही एक बङे पेपर में डेली कॉलम लिखने के लिये अनुबंध दिलवा दूंगा । और नही मानी तो...तुम जानती हो, तुम्हारे लेखन का यही अंतिम पड़ाव होगा | बस मेंरी बात मान लो । ये कहते हुए कई पुस्तकों के लेखक , जाने- माने विद्वान प्रोफेसर साहब ने बङी ही ढिटाई से उसका हाथ पकङकर अपनी ओर खींचकर अपने तपते हुंए होंठ उसके होंठों पर रख दिए । उसने घबराकर खुद को जैसे- तैसे उनकी गिरफ्त से आजाद किया और बिना कुछ बोले अपने लिखे हुए सारे आर्टिकल और कहानियाँ वही छोड़कर दरवाजे की ओर दौङ लगा दी | घर आकर घंटों रगड़ कर नहाती रही | पानी की तेज धार के साथ उसके अश्रु भी बह रहे थे | उसे घिन आ रही थी उस घटिया आदमी पर | कई दिनों तक अपने होंठों पर उस लिजलिजे स्पर्श को महसूस करती रही | तब उसमे इतनी हिम्मत भी नही थी की किसी को ये बात बताती | बताती भी तो सवालों के घेरे में सबसे पहले वही आती | उसने खुद को खामोश कर लिया | कई साल तक कुछ नही लिखा | कई बार अपने लिखे आर्टिकल और कहानियों की पेपर कटिंग को देखकर आंसू बहाती | फिर एक नई हिम्मत कर के उसने कई सालों बाद फिर लेखन शुरू किया | आज अपने लेखन पर अपने ही सबसे अच्छे दोस्त की टिप्पणी सुनकर वो घाव ताजे हो उठे जो इतने सालों से उसने अपने भीतर दबा रखे थे |
आज पन्द्रह साल बाद वो सोच रही थी ।अगर तब वो उस प्रस्ताव को मान लेती तो आज बङी लेखकाओं में उसका नाम शामिल होता । तब उसे ये कभी नही सुनना पङता कि आप निम्न श्रेणी की लेखिका हो । सोचते हुए कुछ बुंदें आंसुओं की अनायास टपक पङी । पर उसे इस समझोते का कोई गम नहीं था ।
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