कुछ यादें ,शीशों सी होती हैं
जब कभी उभरती हैं ज़ेहन में
कभी धुंधली ,कभी चमकदार
कभी डूबती ,स्याह अन्धेरो में
कभी टूटे शीशे की किरचो सी
चुभती.दंश देती …
उफ्फ,कितनी तंज,कितनी बेसब्र
चली आती हैं ,वक्त - बेवक्त
दस्तक भी नही देती कमबख्त…
चली आती हैं ,वक्त - बेवक्त
दस्तक भी नही देती कमबख्त…
सुनो ना ,इन यादों को टांक दो
चांद तारों की तरह
अब इनमे देखना नही चाहती मैं
अपना अस्तित्व …
बल्कि
खुद सृजन करना चाहती हूंखुद को ….
चांद तारों की तरह
अब इनमे देखना नही चाहती मैं
अपना अस्तित्व …
बल्कि
खुद सृजन करना चाहती हूंखुद को ….
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