Thursday, October 2, 2014

पर…पर तुम तो मर चुके हो ।फिर…फिर यहाँ क्या कर रहे हो।वो पसीना पसीना होते हुए बोली।मेंरी रूह को चैन ओ करार नही है,जब तक तुम मुझे माफ नहीं कर दोगी ,में भटकता रहूंगा।खुदा के लिये मुआफ कर दो मुझे।
वो झटके से उठ बैठी।ओह !क्या था ये।कुछ देर खौफजदा बैठी रही।उसे समझ नहीं आ रहा था क्या चल रहा है सब।उसके दिमाग में हर घटना चलचित्र की भांति घुमने लगी।
सामने वाले घर में रहने आया था वो।तब ये लव जेहाद नाम की चिडिया नहीं थी।एक मुहल्ले में बसने वाले कब एक दूजे के दिल में बस गए ।पता ही ना चला।दिन सुनहरे,शामें गुलाबी सी।जमाने से छुपकर प्यार परवान चढता गया।दोनों ने साथ जीने मरने की कसमें खाई थीं।सारी कसमें ,कसमें ही रह गई।
शादी का वादा,वादा भर रह गया।उसे चार दिनों के लिये अचानक बाहर जाना पङ गया।वो चार दिन उसकी दुनिया उजाङ देंगे अगर ये जानती तो कभी नहीं जाती।लौटी तो उसकी दुनिया वीरान थी।वो जैसे उसके जाने के इंतजार में ही था।उसके जाने के अगले दिन वो सेहरा बांध के दुल्हन घर ले आया।
लौटी तो समेटने लायक कुछ बचा ही नहीं था।ना खुद को समेटने की हिम्मत ही बची थी।उसने वहाँ से दूर चले जाने का फैसला किया।मां ने बेटी की सूनी आंखों को पङ लिया।
अब कुछ नहीं बचा था उसके पास जो उसे वहाँ रोकता।कमजोर नहीं थी कि जान दे देती।जब वो जी सकता हे तो में क्यूं नहीं।बिना एक भी आंसु टपकाए वो बङी बहन के घर आ गई।छोङ दी वो दुनिया जहां उसका दिल धङकता था।उसके सामने रहकर ना वो खुद को कमजोर करना चाहती थी ना उसे ग्लानी का अहसास कराना चाहती थी।उसने तो एक बार भी पूछने की कोशिश तक नहीं की कि आखिर तुमनें ऐसा क्यूं किया।नए शहर में खुद को काम में झोंक दिया।भूली नहीं थी उसे पर याद भी नहीं करती थी।बस शादी कभी ना करने का फैसला कर लिया।उसके बाद कभी लौटी नहीं उन गलियों में।
कुछ सालो बाद पता चला किसी नें उसे गोळी मार दी और वो वहीं मर गया।लौटने की हिम्मत तब भी नहीं बची थी।पर आज अचानक…उसने उन गलियों में लौटने का फैसला किया।
बरसों बाद जब उन गलियों में कदम रखा।उसके पैर कांप रहे थे।जी चाह रहा था।उलटे कदम लौट जाए।कांपते कदमों से उसकी कब्र पर जाकर अपनी अकीदत के फूल चढाए।मेंने तुम्हे माफ किया जावेद…बरसों से दिल में जमे आंसू पलकों का तट बांध तोङ चले।वो फूटफूट कर रो पङी।मैंने तुम्हें माफ किया …माफ किया जावेद…और उसके प्राण वही उङ गए।

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