Friday, October 17, 2014

शब्दों की पुकार

कभी कभी शब्द
खो देते हैं अपने मायने
अपने होने का अर्थ
हम पुकारते रह जाते हैं
पर आवाज़ कहीं गुम हो जाती है
पहुचती नही लोगों के कानों तक
या शायद भुल जाती है
गले से निकलना
या खो जाती है
किसी अंतहीन गली के
अंतहीन सिरों में …
तो इन शब्दो के मायने ही क्या
क्यू हैं ये हमारी ज़िंदगी में
मिट क्यू नही जाते ये
तब ना होगी पुकार
न होगा दंश
की किसी ने नहीं सुनी पुकार
तब
नही खोएंगे शब्द
अपना अर्थ
अपने होने के मायने
ओ शब्द तुम खो जाओ

4 comments:

  1. बहुत खुबसूरत अंदाज़-ए-बयां ...शुभ कामनाएं !!!

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  2. खूबसूरत कविता
    वैचारिकता का पुट

    कंडवाल मोहन मदन

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  3. बहुत ही प्रभावशाली रचना।.

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