पिछले 15 दिनो से वो बहुत बैचेन थी.ना दिन को चैन ना रातों को करार था।थक गई थी वो।किसे बताए,कैसे समझाए अपने अंदर की तङप को।कोई समझने वाला भी तो हो।उसने करवट बदलकर सोने का प्रयास किया।पर अपने अंदर चलते विचारों के प्रवाह ने उसे सोने ना दिया।उसने मोबाइल की तरफ हाथ बढाया।ना कोई कॉल था ना मैसेज।क्या करे।किसी से बात करके अपने मन को हल्का करना बहुत जरूरी लगा।सिर्फ एक ही व्यक्ति हे जिसे वो कॉल कर सकती हे।उसने एक नजर घङी की ओर डाली।12बजकर 15 मिनट हो रहें हैं।अभी जाग ही रहा होगा।हमेशा की तरह फेकबुक पर लगा होगा।फेक लोगों के साथ।हंह।ये फेकबुक भी अजीब शय हे।जो वास्तविक रिश्ते हैं उनसे तो कोसों दूर कर देती हे और जो आभासी हैं उनके करीब ले आती हे।
रहनें देती हूँ ।नहीं डिस्टर्ब करती।सोचकर मोबाइल को फिर रख दिया तकिये के नीचे ओर सोने का असफल प्रयत्न करने लगी।एक वक्त था।जब भी नींद खुलती ,उसके मोबाइल पर कोई ना कोई मैसेज जरूर होता था।अब तो अरसा हुआ।कोई मैसेज नहीं करता।आखिर वो उठ बेठी।मोबाइल उठाया नम्बर ,वो तो मिलाना ही नहीं होता।बस एक यही तो हे जिससे बात करती हे वो।वरना दोस्त तो बनाए ही नही उसने ।
झिझकते हुए उसने कॉल किया।काफी देर बाद उधर से कॉल अटेंड किया।सो रहा हूँ।
मुझे बात करनी हे।नींद नहीं आ रही।
सुबह बात करेंगे अभी सो जाओ।तो मुझे सुला दो।फिर सोना।
उधर लम्बी खामोशी।सुला दो ना।प्लीज ।सो जाओ यार।
मन दरपन कहीं चटक सा गया।ये वही हे जो आधी रात को कॉल करता तो उसका कॉल अटेंड करना जरूरी होता था।ओर आज जब उसे जरूरत हे तब …जिसके पीछे कभी नींद ,भूख-प्यास,रात-दिन कुछ नहीं देखा।जिसके कारण अपनी मानसिक शांति ,अपना दोस्त सब गंवा दिया।आज वही,एक गहरी साँस ली उसने।नकाब उतरते देर नहीं लगती यहाँ।चेहरों से नकाब जल्दी ही उतरने लगते हैं।वो फिर से सोने का उपक्रम करने लगी।पर बैचेनी चरम पर थी।उसका हाथ फिर मोबाइल की ओर बढा।क्या में तुम्हे कॉल कर सकती हूँ।तुम्हारे प्यार को सिर्फ इसलिये स्वीकार नहीं किया था कि कहीं तुम्हे खो ना दूँ।पर तुम्हे सिर्फ दोस्त बनकर रहना गवारा ना था।ओर जिस कारण से तुम्हें खोना नहीं चाहा था।उसी कारण से तुम्हे खो दिया।मोबाइल की तरफ बढता हाथ ,थम गया।तुम भी नहीं समझोगे।अगर समझते तो यूँ दूर नहीं जाते।कुछ पल सोचती रही।अंत में आखिर वो भी फेकबुक की दुनिया में खो गई।
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