मैने मांगा मन,
उसने मांगी देह
मैंने अनाव्रत्त कर दिया खुद को
उघाड दी देह
उसने जी भर रौंदा
देह के हर वृत्त को
उभारों को
सहलाया,मसला
जब उब गया मन
ढीला छोड दिया हर बंधन
हांफते कुत्ते की तरह
अपने होंठों पर तृप्ति की
जुबान फेर पसर गया उसका तन
अब वो लालायित नहीं है
छुने को ठंडा जिस्म
अब नहीं फैलती
उसके होंठों पर वो
छत्तीस इंची मुसकान
क्योंकि अब उसने पा लिया है
जब तब रौंंदने को एक शरीर
मन का क्या है
उसे समझ पाये या ना समझे
उसे तो मतलब है
सिर्फ देह के भुगोल से .......
उसने मांगी देह
मैंने अनाव्रत्त कर दिया खुद को
उघाड दी देह
उसने जी भर रौंदा
देह के हर वृत्त को
उभारों को
सहलाया,मसला
जब उब गया मन
ढीला छोड दिया हर बंधन
हांफते कुत्ते की तरह
अपने होंठों पर तृप्ति की
जुबान फेर पसर गया उसका तन
अब वो लालायित नहीं है
छुने को ठंडा जिस्म
अब नहीं फैलती
उसके होंठों पर वो
छत्तीस इंची मुसकान
क्योंकि अब उसने पा लिया है
जब तब रौंंदने को एक शरीर
मन का क्या है
उसे समझ पाये या ना समझे
उसे तो मतलब है
सिर्फ देह के भुगोल से .......
अद्भुत मन को झकझोरनेवाली कविता...
ReplyDeleteShukriya .Prafulla ji
ReplyDeleteGajab
ReplyDeleteKandwal Mohan madan