पुराना कोई रोग फ़िर से उभर आया है शायद …
कभी-कभी दर्द और रोग भी
मजा देने लगते हैं
जब जिंदगी
सजा सी लगने लगती है
बोझिल होता है मन और
शिथिल होने लगता है तन
ये दर्द ही हमें
अपने होने अहसास दिलाते हैं
वरना यूँ तो गुम हो जाते हैं हम
इस दुनिया की भीड में
कहाँ किसी को है फुरसत कि
वो झांके खुद में ही.....
दर्द ही आभास देता है कि
जिंदगी मुझमें
बाकि है अब भी......
कभी-कभी दर्द और रोग भी
मजा देने लगते हैं
जब जिंदगी
सजा सी लगने लगती है
बोझिल होता है मन और
शिथिल होने लगता है तन
ये दर्द ही हमें
अपने होने अहसास दिलाते हैं
वरना यूँ तो गुम हो जाते हैं हम
इस दुनिया की भीड में
कहाँ किसी को है फुरसत कि
वो झांके खुद में ही.....
दर्द ही आभास देता है कि
जिंदगी मुझमें
बाकि है अब भी......
सकारात्मक सोच की कविता
ReplyDeleteजीवन दर्शन सी
वाह
kmm क म मो
शुरुआत से लेकर अंत तक आपने बाँध कर रखा... कविता बहत अच्छी लगी
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