Clouds come floating into my life, no longer to carry rain or usher storm, but to add color to my sunset sky ― Rabindranath Tagore
Friday, October 17, 2014
Wednesday, October 15, 2014
जब हवाओं में सिहरन हो
हल्की गुलाबी ठंड हो
हवाएं छू कर जाएं तेरी उड़ती जुल्फो को
तब याद करना तुम मुझे
मेरे साथ गुजरे वो पल
जब सर्द हवाओं ने
हाथ तेरा थामा था
और मेने
अपनी नर्म हथेली को
तेरे हाथों से छुआ दिया था
एक ही पल में
बिना देरी किये
तुमने कसकर जकड़ लिया था मुझे
अपनी बाहों में और
रख दीये थे
मेरे कापते लरजते होठों पर
अपने होठ
प्रीत की वो पहली मुहर
भूल मत जाना
भूल मत जाना प्रितम
हल्की गुलाबी ठंड हो
हवाएं छू कर जाएं तेरी उड़ती जुल्फो को
तब याद करना तुम मुझे
मेरे साथ गुजरे वो पल
जब सर्द हवाओं ने
हाथ तेरा थामा था
और मेने
अपनी नर्म हथेली को
तेरे हाथों से छुआ दिया था
एक ही पल में
बिना देरी किये
तुमने कसकर जकड़ लिया था मुझे
अपनी बाहों में और
रख दीये थे
मेरे कापते लरजते होठों पर
अपने होठ
प्रीत की वो पहली मुहर
भूल मत जाना
भूल मत जाना प्रितम
Thursday, October 2, 2014
patathar
उसे बडा गुस्सा आ रहा था।तेल का डब्बा उठाए वो चल पङी।ये माँ हमेशा ऐसा ही
करती है। पहले सामान मंगवाती हैऔर फिर भेजती है ।ये लाला भी ना हमेशा जानकर
के गलत सामान ही देता है।कितनी गंदी नजर से देखता है।और सामान पकङाने के
बहाने जिस तरह वो उसे छूने की कोशिश करता है।उसका मन करता है खून पी
जाए।माँ को कैसे समझाऊं कि मुझे सामान लेने मत भेजा करो।पर वो भी बेचारी
क्या करे।सुबह से काम पर जाती है,तब उन्हें दो वक्त का खाना मिलताहै।काश
बापु दारू ना पीता।वो होता तो उसे नहीं जाना पङता दुकान पर।वो तो जहरीली
दारू से मर गया और पीछे छोङ गया हमें दरिंदों के लिये।सोचते सोचते जोर की
ठोकर लगी।वो गिरते-गिरते बची।पर उसे एक नई राह दिखा दी उस पत्थर ने।उसने
कसकर मुट्ठी में जकङ लिया पत्थर को।और चल पङी लाला की दुकान पर ।
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