Friday, October 17, 2014

लिखना चाहती थी
एक प्रेम कविता
जिसमे तुम होते
मैं होती
होता वो
खुला आकाश
कि
जिसके तले
मिल कर
सजाए थे
कुछ ख्वाब
कुछ हसरतें …
………

पर लिख रही हूं
तुम्हारे मेरे बीच की
बढती गलतफहमीया
गहराते अंधेरो में
गुम होते हम तुम
बढता अविश्वास
घटती दीवानगी
बढती बैचेनी
क्या
प्यार बचा है हममे
अब भी …


मिली की आंखों में आंसू थे।उसने एक नजर चाँद को देखा ओर एक नजर लाल टी-शर्ट वाले की तसवीर को।भारी मन से तसवीर सामने रख कर ,पहले चांद की और फिर लाल टी-शर्ट वाले की तसवीर की पूजा करके चाँद को अर्ग दिया।उसे पूरा भरोसा था,उन दोनों के मध्य फासले भले बढ गए हों,फैसला प्यार के हक में ही होगा।मतभेद ,मनभेद में नहीं बदलेगा।उनका प्यार कभी कम नहीं होगा।वो करवा चौथ के दिन जरूर आएगा।उसने वो तमाम खिङकी ,दरवाजे खोल दिये थे।जिसे उसने बङी ही मजबूती से बंद कर दिया था और फिर भी जिनकी दरारों से प्यार हरदम टपकता रहता था।आसमान का चाँद तो आ गया था।अब उसे इंतजार था तो बस …अपने चाँद का।

Wednesday, October 15, 2014

जब हवाओं में सिहरन हो
हल्की गुलाबी ठंड हो
हवाएं छू कर जाएं तेरी  उड़ती जुल्फो को
तब याद करना तुम मुझे 
मेरे साथ गुजरे वो पल
जब सर्द हवाओं ने 
हाथ तेरा थामा  था
और मेने 
अपनी नर्म हथेली को
तेरे हाथों से छुआ दिया था
एक ही पल में 
बिना देरी किये 
तुमने कसकर जकड़ लिया था मुझे 
अपनी बाहों में और
रख दीये थे 
मेरे कापते लरजते होठों पर 
अपने होठ
प्रीत की वो पहली मुहर
भूल मत जाना 
भूल मत जाना प्रितम

Tuesday, October 14, 2014

क्या मिल पाएंगे
हम तुम
फ़िर कभी या
कि जैसे मिलती हे
धरा आसमां से
उसी तरह
 रह जाएंगे
 हम तुम

Thursday, October 2, 2014

patathar

उसे बडा गुस्सा आ रहा था।तेल का डब्बा उठाए वो चल पङी।ये माँ हमेशा ऐसा ही करती है। पहले सामान मंगवाती हैऔर फिर भेजती है ।ये लाला भी ना हमेशा जानकर के गलत सामान ही देता है।कितनी गंदी नजर से देखता है।और सामान पकङाने के बहाने जिस तरह वो उसे छूने की कोशिश करता है।उसका मन करता है खून पी जाए।माँ को कैसे समझाऊं कि मुझे सामान लेने मत भेजा करो।पर वो भी बेचारी क्या करे।सुबह से काम पर जाती है,तब उन्हें दो वक्त का खाना मिलताहै।काश बापु दारू ना पीता।वो होता तो उसे नहीं जाना पङता दुकान पर।वो तो जहरीली दारू से मर गया और पीछे छोङ गया हमें दरिंदों के लिये।सोचते सोचते जोर की ठोकर लगी।वो गिरते-गिरते बची।पर उसे एक नई राह दिखा दी उस पत्थर ने।उसने कसकर मुट्ठी में जकङ लिया पत्थर को।और चल पङी लाला की दुकान पर ।